स्वयंसेवक आधारित सनातन संस्कृति

 सनातन संस्कृति का आधार स्वयंसेवकों के संस्कार 

विश्व की एकमात्र संस्कृति जो स्वत: ही इस ब्रहमांड के प्रत्येक अव्यय में स्वत: ही विद्यमान(स्फुरित) रहती है और अनादि काल से उसकी मूल प्रवृत्ति रही है। प्रकृति के इस स्वयं संचलन (स्वयं चलने की प्रक्रिया) का आधार नियमबद्धता, परस्पर सजीव/निर्जीव की निर्भरता और ऊर्जा(जीवन शक्ति) का निरंतर प्रवाह है। यह ब्रह्मांडीय व्यवस्था सदा बाहरी नियंत्रण के बिना, स्वतःस्फूर्त ढंग से संतुलित और गतिशील रहती है। यही सनातन संस्कृति है जिसमें स्वयं की प्रेरणा से प्रत्येक घटक अपने दायित्वों का निर्वहन अपनी क्षमताओं के अनुसार निरंतर पीढ़ी दर पीढ़ी करता रहा है।

सनातनी संस्कार: जीवन जीने के प्राकृतिक नियमों का अनुसरण (Way of Life)


सनातन का सच नहीं जानेंगे तो खेती, स्वास्थ्य एवं धर्म के नाम पर ठगे जाते रहेंगे।

जीवन जीने का एक प्राकृतिक नियम यानि
स्वयं संचलन की प्रक्रिया या प्रवृत्ति। बिना किसी अपेक्षा या किसी से आपेक्षित व्यवहार या परिणाम के निरंतर काल, समय और परिस्थितियों में अपनी प्रकृति/प्रवृत्ति का निर्वाह।

यह जीवनशैली या नियम केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है बल्कि जलचर, नभचर, स्थलचर वनस्पतियों, जीव-जंतुओं, कीडेमकोडॉ, जलस्रोतों, नदियों, तलाबों आदि द्वारा भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अनवरत धारित रही है।

मनुष्य भी जब उसे बाधित नहीं करते तो वह स्वयं सेवक संस्कृति हर प्रकार के वातावरण व विकट परिस्थितियों में भी सहजता से सामंजस्य बैठा लेते हैं क्योंकि कुछ भी अनिश्चित नहीं होता, सभी की प्रकृति, व्यवहार और प्रतिक्रिया पूर्ववर्त या सुनिश्चित/आपेक्षित ही रहता है उनकी बढ़ी/घटी क्षमताओं के सापेक्ष

सनातन संस्कारों का आधार स्वयंसेवक की अनावृत्त प्रवृत्ति 

इस श्रृष्टि के समस्त अवयवों को सनातन दृष्टि से समझना उनकी इस अनावृत्त प्रवृत्ति को आत्मसात करना, इन सनातनी संस्कारों के अनुरूप ही सदा ढलने/ढालने का क्रम इस वातावरण की निरंतरता को अबाधित रखती है इसमें कहीं भी कभी भी स्वार्थ, संकीर्णता की व्यापकता दीर्घकालिक नहीं होती क्योंकि बदले व्यवहार से उत्त्पन्न परिस्थितियों में सभी अवयवों में उनकी प्रकृति/प्रवृत्ति के अनुसार प्रतिक्रियात्मक आचरण, पुन: उसे विवश कर मूल आचरण कि ओर लौटने को विवश करते हैं जो कुछ समय अन्तराल पर प्रभाव दिखाता है।

वर्तमान काल-खण्ड भी स्वयंसेवक आधारित सनातन संस्कृति के पुनर्जागरण कास्वर्णिम कालखण्ड है जो निःस्वार्थ भाव से मानवता, नैतिकता और वसुधैव कुटुंबकम् जैसे मूल्यों को पुनर्स्थापित करने हेतु पुन: विश्व में वातावरण तैयार कर चुकी है और अब उसका अनुभव भी सभी स्थानों में प्रत्यक्ष रूप से होने लगा है।


 स्वयंसेवक आधारित सनातन संस्कृति to be continued ....

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स्वयंसेवक आधारित सनातन संस्कृति

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